Saturday, July 31, 2010
Friday, July 30, 2010
Thursday, July 29, 2010
ahesas...........
रात कल अँधेरे में ज़हन के खुली छत पर,
जाने कों आया था सीढियां महकती है,
फूल सा बदन उसका छु लिया था सपने में ,
अब तलक उसकी खुशबू से उँगलियाँ महकती हैं।
जाने कों आया था सीढियां महकती है,
फूल सा बदन उसका छु लिया था सपने में ,
अब तलक उसकी खुशबू से उँगलियाँ महकती हैं।
Sunday, July 25, 2010
Friday, July 23, 2010
Thursday, July 22, 2010
Wednesday, July 21, 2010
Tuesday, July 20, 2010
bebasi
दसियों सालसे हम बेबस है हम अपनी आखो के सामने हमारे लोगो को बढ़ में तबाह हो रहे हाय, ओर हम लचर व बेबस की तरह देख रहे हये , शाशन प्रशाशन हमारे दुखों को समझने की जगह हमे इस समस्या से छुटकारा दिलाने के नाम पर अरबो का खेल खेल जहा हाय ,अब हमें जागना होगा अपने लिए नहीं तो अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए
Thursday, July 15, 2010
patrkar aur sanghrash
मुशकील में पतरकारिता
अब पत्रकारों को पत्रकारिता मुशकील हो गई है . यह मुशकील जिस तरह से शाशन प्रशाशन खड़ी कर रहा हमे उस पर गहनता से विचार करना पड़ेगा . बड़ी बड़ी आतंकवादी घटनाऊ के कव्राज़ में हम हंसी हंसी मौत को गले लगते आये है.लेकिन जिस तरह से लखनऊ में पत्रकारों के साथ बुरा बर्ताव किया अगर इस्पे viram नहीं लगा तो मुश्किलें और बढ सकती है jarorat है हमे सामूहिक तौर पर vichar कर के इसका समाधान nikalne की
अब पत्रकारों को पत्रकारिता मुशकील हो गई है . यह मुशकील जिस तरह से शाशन प्रशाशन खड़ी कर रहा हमे उस पर गहनता से विचार करना पड़ेगा . बड़ी बड़ी आतंकवादी घटनाऊ के कव्राज़ में हम हंसी हंसी मौत को गले लगते आये है.लेकिन जिस तरह से लखनऊ में पत्रकारों के साथ बुरा बर्ताव किया अगर इस्पे viram नहीं लगा तो मुश्किलें और बढ सकती है jarorat है हमे सामूहिक तौर पर vichar कर के इसका समाधान nikalne की
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