bebak
Thursday, July 29, 2010
ahesas...........
रात कल अँधेरे में ज़हन के खुली छत पर,
जाने कों आया था सीढियां महकती है,
फूल सा बदन उसका छु लिया था सपने में ,
अब तलक उसकी खुशबू से उँगलियाँ महकती हैं।
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment